श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12
आत्मा, कर्म, बंधन, मोक्ष और ईश्वर...ये ऐसे प्रश्न हैं जो हर युग में मानव मन को झकझोरते रहे हैं. क्या आत्मा वास्तव में जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधी होती है या यह केवल माया का भ्रम है? कर्म कैसे हमारे अगले जन्म का निर्धारण करते हैं? मोक्ष क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
इस विस्तृत लेख में इन्हीं गूढ़ प्रश्नों का उत्तर वेद, उपनिषद और गीता के शास्त्रीय आधार पर सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है. आत्मा के वास्तविक स्वरूप से लेकर कर्म-बंधन, माया, ईश्वर-तत्त्व और मुक्ति तक की संपूर्ण यात्रा को समझाने का यह प्रयास है.
क्या आत्मा वास्तव में बंधन में होती है या यह केवल भ्रम है?
यद्यपि आत्मा अपने मूल और वास्तविक स्वरूप से दिव्य, शुद्ध, स्वतंत्र और चेतन है, फिर भी भगवान की माया के प्रभाव से वह स्वयं को बंधन में बंधा हुआ अनुभव करती है. यह बंधन आत्मा का स्वाभाविक गुण नहीं है, बल्कि माया से उत्पन्न हुआ एक भ्रम मात्र है. इसी भ्रम के कारण आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है और स्वयं को सीमित मानने लगती है, जबकि वास्तव में वह नित्य मुक्त है.
आत्मा बार-बार नए शरीर क्यों धारण करती है?
यद्यपि आत्मा एक के बाद एक अनेक स्थूल शरीरों को धारण करती रहती है, तथापि उसका लिंग शरीर पहले से ही लगभग एक जैसा बना रहता है. आत्मा के नए-नए शरीर धारण करने के पीछे मुख्य कारण उसके द्वारा किए गए कर्म होते हैं. मानव जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों के कारण जीव पर पुण्य और पाप का संचय होता है. अच्छे कर्म करने से पुण्य प्राप्त होता है और बुरे कर्म करने से पाप का संग्रह होता है.
पुण्य और पाप क्या हैं और वे आत्मा को कैसे प्रभावित करते हैं?
ये पाप और पुण्य जीवात्मा के हृदय या अंतःकरण पर अंकित हो जाते हैं और वहीं निवास करते हैं. जिस प्रकार हमारे जीवन की पुरानी घटनाएँ, अनुभव और स्मृतियाँ हमारे भीतर संग्रहीत रहती हैं, उसी प्रकार पाप और पुण्य भी हमारे भीतर संगृहीत रहते हैं और समय के साथ परिपक्व होते जाते हैं. उपयुक्त समय आने पर वे अपने-अपने फल देने लगते हैं.
क्या कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है या अगले जन्म में?
कुछ पाप और पुण्य इसी जीवन में अपना फल प्रदान करते हैं, जबकि कुछ का फल अगले जन्म में प्राप्त होता है. वास्तव में अच्छे और बुरे कर्मों के फलों को भोगने के लिए आत्मा चाहे या न चाहे, उसे बलपूर्वक अगले जन्म में जाना ही पड़ता है. उसी जन्म में उसे अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुःख का अनुभव करना पड़ता है.
कर्म-बन्धन क्या है और यह कैसे काम करता है?
पाप और पुण्य का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि चाहे आत्मा की इच्छा हो या न हो, और चाहे आत्मा को यह कितना भी लगे कि उसका अगला जन्म किसी विशेष प्रकार का होना चाहिए, फिर भी अगला जन्म केवल और केवल उसके कर्मों के फल के अनुसार ही प्राप्त होता है. कर्म के इस अपरिहार्य प्रभाव को ही कर्म-बन्धन कहा जाता है.
मनुष्य इस बंधन को बंधन क्यों नहीं समझ पाता?
जिस प्रकार एक बैल को रस्सी से बाँधकर बलपूर्वक घसीटकर कहीं ले जाया जाता है, उसी प्रकार कर्म ही आत्मा को अगले जन्म की ओर ले जाते हैं. यह प्रभाव अनिवार्य है और इससे कोई बच नहीं सकता. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह होती है कि यदि किसी बैल को बाँधकर ऐसे स्थान पर ले जाया जा रहा हो जहाँ वह स्वयं भी जाना चाहता हो, तो वह उस ले जाए जाने को बंधन नहीं समझेगा. यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अपराधी कारागृह में रहने को ही अच्छा मानने लगे.
क्या हम यह जान सकते हैं कि कितने जन्म और बाकी हैं?
साधारण परिस्थितियों में इस कर्म-बन्धन से मुक्ति संभव नहीं होती. शास्त्रीय भाषा में इस अवस्था को ही ‘बन्ध’ कहा गया है. यह समझ पाना अत्यंत कठिन है कि पिछले जन्मों में कौन-कौन से और कितने कर्म किए गए थे. इसी कारण यह निश्चित रूप से कहना भी संभव नहीं है कि भविष्य में कितने और कौन-से जन्म होंगे, और उन जन्मों में फिर कौन-कौन से शुभ या अशुभ कर्म हो जाएंगे. यही अनिश्चितता निरंतर बनी रहती है, और उसी अनिश्चितता के बीच हम सभी जीवन व्यतीत कर रहे हैं.
ब्रह्मज्ञान आत्मा को कैसे मुक्त करता है?
कर्म का प्रभाव इतना शक्तिशाली और व्यापक होता है कि यदि कोई जीव विशेष और सजग प्रयास नहीं करता, तो वही कर्म उसे अनंत जन्मों तक जन्म-जन्मांतर के चक्र में घुमाता रहता है. शास्त्रों में इसी अवस्था को महाभय, महाविनाश आदि शब्दों से संबोधित किया गया है. आत्मा का इसी जन्म में कर्म-बन्धन से मुक्त होना न केवल आवश्यक है, बल्कि पूर्णतः संभव और अत्यंत लाभकारी भी है. वास्तव में यही आत्मा का परम कल्याण है.
मोक्ष को परम कल्याण क्यों कहा गया है?
इसके अतिरिक्त जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सब भ्रम है, मात्र भटकाव है, मानो गहरी नींद में चलते रहना हो. मनुष्य चाहे जितना भी भटकता रहे, किसी न किसी समय उसे इस वास्तविक स्थिति को समझना ही पड़ता है और इस बंधन से बाहर निकलना ही होता है. कारण यह है कि बंधन में भटकते रहना आत्मा का स्वभाव नहीं है. आत्मा तो मूलतः नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप वाली है. कर्म के बंधन से इस मुक्ति को ही मोक्ष या मुक्ति कहा जाता है, और यह मनुष्य का एक प्रमुख पुरुषार्थ भी है.
मुक्ति के बाद आत्मा की अवस्था कैसी होती है?
मुक्त आत्मा अपनी वास्तविक, आनन्दमय अवस्था में स्थित होती है. जिस प्रकार कोई नदी सागर में जाकर विलीन हो जाती है. भले ही उसका नदी रूप समाप्त हो जाए, पर वह सागर-रूप बन जाती है. उसी प्रकार आत्मा की अवस्था होती है. जल की एक बूंद यदि सागर में मिल जाए, तो वह बूंद नहीं रह जाती, बल्कि सागर का ही स्वरूप धारण कर लेती है.
मुक्ति के लिए मनुष्य का कर्तव्य क्या है?
इसी प्रकार यदि कोई घड़ा फूट जाए, तो घड़े के भीतर का आकाश नष्ट नहीं होता, बल्कि वह महाकाश के साथ एक हो जाता है. ठीक यही अवस्था मुक्त हुई आत्मा की होती है. वह सीमित पहचान से मुक्त होकर असीम और दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है. अतः प्रत्येक व्यक्ति को मुक्ति के लिए निरंतर प्रयास और अभ्यास करना चाहिए. प्रत्येक जीव का प्राथमिक कर्तव्य ऐसा जीवन जीना है, जो उसे बंधन से मुक्ति की दिशा में ले जाए. बंधन से मुक्ति तक की यह यात्रा जाने-अनजाने सभी को करनी ही पड़ती है. इन सिद्धांतों का ज्ञान न होना, या ज्ञान होने पर भी इनके महत्त्व को न समझ पाना, यही कारण है कि मनुष्य मुक्ति के साधनों के प्रति कभी अधिक, तो कभी अत्यंत कम जागरूक दिखाई देता है.
ईश्वर को जानना मुक्ति के लिए क्यों आवश्यक है?
इस मुक्ति को प्राप्त करने के लिए आत्मा को सर्वप्रथम अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है. इसी के साथ-साथ इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले, देवों के भी देव, समस्त जगत के नियन्ता परमेश्वर को तत्त्वतः जानना भी अनिवार्य है. उसी परमेश्वर को देवाधिदेव, जगदीश, जगन्नाथ, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, मायाधीश, परमेश्वर, परमात्मा आदि अनेक नामों से पुकारा गया है. वह सर्वव्यापी है, सर्वशक्तिमान है और सर्वज्ञ है. उसका कोई भौतिक आकार नहीं है, इसलिए वह निराकार है. वही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी और अधीश्वर है. ब्रह्माण्ड के सभी सूत्र उसी के अधीन हैं, इसी कारण उसे महेश्वर कहा गया है.
क्या अनेक देवी-देवताओं की पूजा गलत है?
जगत का स्वामी एक ही है, न दो हैं और न ही अनन्त. इसलिए उसी एक परमेश्वर की पूजा, आराधना, ध्यान, श्रद्धा और भक्ति करनी चाहिए तथा उसी का नाम-स्मरण करना चाहिए. जब जगत के स्वामी के ऊपर और कोई नहीं है, तो उन्हें छोड़कर किसी अन्य की उपासना करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती. तथापि, आवश्यकता पड़ने पर अन्य देवी-देवताओं की पूजा की जा सकती है, किंतु उनकी निंदा या तिरस्कार कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे सभी जगत के स्वामी के ही अवतार या दूत माने जाते हैं.
माया क्या है और यह आत्मा को कैसे भ्रमित करती है?
हिंदू धर्म में यह भी एक सिद्धांत है कि एक ही ईश्वर समय-समय पर मानव रूप में अवतार लेकर प्रकट होता है. राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि इसी परम्परा के अंतर्गत माने जाते हैं. विश्वनाथ या भगवान एक ही हैं, जो संसार की रचना, पालन और संहार करते हैं. जगत के नाथ सैकड़ों नहीं हो सकते और न ही एक से अधिक हो सकते हैं. केवल उन्हीं से मुक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, अन्य किसी से नहीं, क्योंकि समस्त सूत्र उन्हीं के हाथों में हैं. यद्यपि ईश्वर के स्वरूप को लेकर मतभेद हो सकते हैं कि वह वास्तव में कैसा है, किंतु इस बात पर कोई मतभेद नहीं है कि ईश्वर एक ही है, सैकड़ों नहीं.
(अथातो ब्रह्मजिज्ञासा. जन्माद्यस्य यतः.- ब्रह्मसूत्र 1.1, 1.2)
(अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्. प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥ गीता 4.6)
(दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया. मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ गीता 7.14)
संसार और जन्म-मृत्यु का चक्र क्या है?
ईश्वर की एक विशेष शक्ति है, जिसे माया कहा जाता है. उसी माया के प्रभाव से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाती है और स्वयं को एक साधारण, नश्वर शरीर मानने लगती है. यद्यपि आत्मा मूलतः स्वतंत्र है, फिर भी वह स्वयं को माया से बंधा हुआ समझने लगती है. यह बंधन वास्तविक नहीं, बल्कि केवल एक मान्यता है.
जिस प्रकार किसी घर का दरवाज़ा खुला हुआ हो, फिर भी कोई व्यक्ति दूसरी ओर देखकर यह कहने लगे कि “दरवाज़ा बंद है, मुझे बाहर जाना है, मैं फँस गया हूँ”, तो वहाँ दरवाज़ा खोलने की नहीं, बल्कि उस भ्रम को दूर करने की आवश्यकता होती है. उसी प्रकार आत्मा के वास्तविक स्वरूप के ज्ञान से ही बंधन स्वतः नष्ट हो जाता है.
(अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥ गीता 5.15)
(ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः. तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥ गीता 5.16)
वेद इस सम्पूर्ण सत्य को कैसे संक्षेप में बताते हैं?
इस प्रकार दिव्य स्वभाव वाली आत्मा जगत के ईश्वर की माया के कारण ही स्वयं को शरीर मान बैठती है. शरीर के प्रति मोह के कारण ही मनुष्य शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म करता है. उन्हीं कर्मों के फलों को भोगने के लिए वह नए-नए शरीर धारण करने को विवश होता है. एक शरीर का त्याग करना ही मृत्यु कहलाता है और नया शरीर धारण करना ही जन्म है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं.
इसी जन्म-मृत्यु के चक्र में आत्मा फंसी हुई बार-बार घूमती रहती है. इस निरंतर घूमने को ही संसार कहा जाता है और इसी को बंधन कहा जाता है. वही आत्मा जब ईश्वर की भक्ति के माध्यम से वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करती है, तब वह मुक्त हो जाती है. यह समस्त ज्ञान हमें वेदों से प्राप्त होता है. यही ज्ञान वेदों के आधार पर लिखी गई पुस्तकों में भी मिलता है और गुरु परम्परा के माध्यम से जीव को प्रदान किया जाता है.
(शास्त्रयोनित्वात् - ब्रह्मसूत्र 1.3)
(वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् - मनुस्मृति)
उपरोक्त विस्तृत विषय को वेदों के एक ही मंत्र में संक्षेप में व्यक्त किया गया है, जो इस प्रकार है...
वेदाहमेतं पुरुषं महन्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्.
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
-श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.8
अर्थात- मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी है और अंधकार से परे है. केवल उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार जा सकता है. इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है.