दिल्ली में राजस्थान की 600 साल पुरानी फड़-पिचवाई कला: ‘The Sacred Aesthetics’ में जिंदा होगी आस्था की कहानी


दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच अगर अचानक कोई आपको राजस्थान के शांत रेगिस्तानी गांवों में ले जाए. जहां दीपक की लौ के सामने बैठा एक कलाकार कपड़े पर कहानी उकेर रहा हो और हर रंग के पीछे एक देव कथा सांस ले रही हो तो कैसा लगेगा? कुछ ऐसा ही अनुभव इस बार राजधानी में होने जा रहा है.

दरअसल, राजस्थान की सदियों पुरानी फड़ और पिचवाई कला अब सीधे दिल्ली के दिल में उतरने वाली है. मार्च 2026 में बीकानेर हाउस में लगने वाली प्रदर्शनी 'The Sacred Aesthetics' सिर्फ एक आर्ट एग्जीबिशन नहीं, बल्कि परंपरा, आस्था और इतिहास का जीवंत संगम बनने जा रही है.

क्या है ‘The Sacred Aesthetics’ और क्यों हो रही है इतनी चर्चा?

यह कहानी शुरू होती है 20 मार्च से, जब दिल्ली के इस हेरिटेज भवन में चार दिन के लिए राजस्थान की आत्मा उतर आएगी. 23 मार्च तक चलने वाली इस प्रदर्शनी को Rooftop और Indiyart मिलकर प्रस्तुत कर रहे हैं. यहां सिर्फ पेंटिंग्स नहीं होंगी. यहां सदियों पुरानी परंपराएं होंगी, जिन्हें दो कलाकार अपनी कला के जरिए जिंदा रखे हुए हैं- प्रकाश जोशी और मुकुट जोशी.

फड़ पेंटिंग: जब चित्र बन जाते थे मंदिर

कहानी आपको ले जाती है राजस्थान के भीलवाड़ा में, जहां करीब 600 साल पहले फड़ पेंटिंग की शुरुआत हुई. ये कोई आम पेंटिंग नहीं थी. इसे भोपाओं द्वारा गांव-गांव ले जाया जाता था. जैसे कोई चलता-फिरता मंदिर. रात के अंधेरे में, एक दीपक जलता और उसके सामने खुलती एक लंबी कपड़े की स्क्रॉल... और फिर शुरू होती देवताओं की कहानी- गीतों और चित्रों के जरिए.

फड़ की दुनिया में हर चीज का मतलब होता है-

रंग प्राकृतिक होते हैं, लेकिन भाव गहरे

कोई परिप्रेक्ष्य नहीं, लेकिन हर किरदार की अपनी जगह

एक ही चित्र में पूरी कथा

किनारों पर बारीक सजावट

यह सिर्फ कला नहीं, बल्कि कहानी सुनाने की परंपरा है.

प्रकाश जोशी- विरासत को संभालता एक कलाकार

इस परंपरा को दुनिया तक पहुंचाने का श्रेय श्री लाल जोशी को जाता है. आज उसी मशाल को थामे हुए हैं प्रकाश जोशी. उनके बनाए हर चित्र में वही अनुशासन, वही संतुलन और वही गहराई दिखती है, जो सदियों पहले थी. फर्क बस इतना है कि अब ये कहानियां गांव से निकलकर दुनिया तक पहुंच रही हैं.

पिचवाई- जब भक्ति रंगों में ढल जाती है

अब कहानी मुड़ती है नाथद्वारा की ओर, जहां श्रीनाथजी मंदिर में भगवान कृष्ण की सेवा में पिचवाई कला का जन्म हुआ. यहां पेंटिंग बनाना सिर्फ कला नहीं, पूजा है. हर चित्र भगवान के पीछे सजाने के लिए बनाया जाता है. जैसे एक भक्त अपनी भावना को रंगों में ढाल रहा हो. पिचवाई की पहचान है- असली सोने और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल, बड़े-बड़े कैनवस, नीले, हरे, सुनहरे जैसे गहरे रंग, रासलीला, त्योहार और ऋतुओं की झलक

मुकुट जोशी: जब कला बन जाती है ‘अर्पण’

मुकुट जोशी की पेंटिंग्स को देखकर ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो. उनके बनाए हर चित्र में सिर्फ रंग नहीं, बल्कि एक शांत ऊर्जा होती है. नाथद्वारा शैली में काम करते हुए वे हर पेंटिंग को एक ‘ऑफरिंग’ मानते हैं- जैसे यह किसी दीवार के लिए नहीं, बल्कि भगवान के लिए बनाई गई हो.

बीकानेर हाउस: जब जगह भी कहानी का हिस्सा बन जाए

दिल्ली का बीकानेर हाउस खुद एक इतिहास है- कभी बीकानेर राजघराने का निवास रहा यह भवन आज भी राजस्थान की खुशबू लिए हुए है. ऐसे में जब इसी जगह पर राजस्थान की ये दोनों कलाएं एक साथ आएंगी, तो यह सिर्फ प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक संस्कृतिक यात्रा बन जाएगी.

क्यों देखनी चाहिए यह प्रदर्शनी?

क्योंकि यहां आपको सिर्फ पेंटिंग नहीं दिखेंगी. यहां आपको समय दिखेगा.

वो समय, जब कला पूजा थी

वो समय, जब चित्रों में कहानियां बसती थीं

वो समय, जब कलाकार अपनी पहचान से ज्यादा अपनी परंपरा के लिए जीते थे

यहां आकर आप सिर्फ दर्शक नहीं रहेंगे, बल्कि उस कहानी का हिस्सा बन जाएंगे.

Rooftop: परंपरा को नई दुनिया से जोड़ने वाला पुल

Rooftop एक ऐसा मंच है जो पुरानी कला को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहा है. डिजिटल और लाइव अनुभवों के जरिए यह कलाकारों और दर्शकों के बीच की दूरी खत्म कर रहा है.

अंत में... जब आप इस प्रदर्शनी से बाहर निकलेंगे, तो आपके साथ सिर्फ कुछ तस्वीरें नहीं होंगी. बल्कि एक एहसास होगा. एक एहसास कि कला सिर्फ देखने की चीज नहीं, बल्कि जीने की चीज होती है. और शायद यही इस पूरी कहानी की सबसे खूबसूरत बात है.