कहानी मेरठ के स्याही के खुशबू की, जो आज प्रिंटिंग इंडस्ट्री के नाम से मशहूर


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

बिहार के किसी छोटे से गांव में एक किसान का बेटा चारपाई पर बैठा है. सामने लकड़ी की मेज पर एक पुरानी सी गाइड बुक रखी है. किताब के कोने मुड़े हुए हैं, कई पन्नों पर नीली स्याही से निशान लगे हैं. वह लड़का रेलवे, पुलिस या एसएससी की परीक्षा की तैयारी कर रहा है.

उससे हजार किलोमीटर दूर उत्तराखंड के पहाड़ों में कोई लड़की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही है. उसके हाथ में भी वैसी ही एक सस्ती किताब है. उत्तर प्रदेश के किसी कस्बे में कोचिंग जाने वाला छात्र भी उसी तरह की किताब से सवाल हल कर रहा है.

इन तीनों छात्रों की जिंदगी अलग है. सपने अलग हैं. संघर्ष अलग हैं.

लेकिन एक चीज कॉमन है.

उनकी किताब.

और उस किताब की शुरुआत होती है मेरठ से.

यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं है. यह उस खामोश क्रांति की कहानी है जिसने करोड़ों भारतीयों तक शिक्षा पहुंचाई, बिना किसी शोर-शराबे के. जब मेरठ सिर्फ सैनिकों का शहर नहीं था. आज लोग मेरठ को खेल उद्योग, क्रांति की धरती या दिल्ली-एनसीआर के हिस्से के रूप में जानते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह शहर कभी हिंदी पट्टी की छपाई राजधानी बन गया था.


कहानी लगभग दो सौ साल पुरानी है?

1806 में अंग्रेजों ने मेरठ कैंट की स्थापना की. सैनिक आए, प्रशासन आया और उसके साथ आया कागज, दस्तावेज और छपाई का काम. उस दौर में भारत में पढ़ना-लिखना कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित था. किताबें महंगी थीं और छापाखाने गिने-चुने. लेकिन मेरठ धीरे-धीरे एक ऐसे रास्ते पर बढ़ रहा था जिसकी मंजिल उसे देश के सबसे बड़े प्रकाशन केंद्रों में से एक बनाने वाली थी.

जब स्याही से बनने लगा इतिहास

1840 और 1850 के दशक में मेरठ के छापाखाने केवल किताबें नहीं छाप रहे थे.

वे विचार छाप रहे थे.

वे बहसें छाप रहे थे.

वे सवाल छाप रहे थे.

उस समय हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशन हो रहे थे. उर्दू अखबार निकलते थे. पर्चे छपते थे. धार्मिक पुस्तकें छपती थीं. सरधना में रोमन कैथोलिक मिशनरियों ने अपना प्रेस स्थापित किया. वहां से फारसी और देवनागरी में सामग्री प्रकाशित होने लगी.


फिर 1857 आया.

जब पूरे उत्तर भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ माहौल बन रहा था, तब छापाखानों से निकलने वाले पर्चों और अखबारों ने भी लोगों तक खबरें और विचार पहुंचाने का काम किया. कई प्रकाशकों और संपादकों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. लेकिन स्याही रुक नहीं सकी.

आजादी के बाद आया असली मोड़

1947 में भारत आजाद हुआ.

लेकिन आजादी के साथ एक नई चुनौती भी सामने थी.

देश के करोड़ों लोगों को पढ़ाना.

गांवों तक शिक्षा पहुंचाना.

हिंदी भाषी राज्यों में लाखों नए छात्र स्कूल और कॉलेजों तक पहुंच रहे थे. प्रतियोगी परीक्षाओं का दायरा बढ़ रहा था. मांग थी- सस्ती किताबों कीऐसी किताबों की जिन्हें किसान का बेटा भी खरीद सके और मजदूर की बेटी भी.


यहीं मेरठ की असली कहानी शुरू होती है.

जब कारोबार नहीं, मिशन बन गई किताबें

दिल्ली के बड़े प्रकाशन संस्थान साहित्यिक बहसों में व्यस्त थे. लेकिन मेरठ के छोटे और मध्यम उद्यमियों ने कुछ और सोचा. उन्होंने कहा कि किताब सुंदर कम हो, सस्ती ज्यादा हो. कागज थोड़ा साधारण हो, लेकिन छात्र तक पहुंचना चाहिए. कवर चमकदार न हो, लेकिन उसमें परीक्षा पास कराने वाला कंटेंट होना चाहिए. बस फिर क्या था. शहर में एक के बाद एक ऑफसेट प्रेस लगने लगे. दिन-रात मशीनें चलने लगीं. कागज के बंडल आते और हजारों किताबें बनकर निकल जातीं.

गांव-गांव पहुंची मेरठ की छपी हुई उम्मीद

अगर आपने कभी रेलवे स्टेशन के बाहर लगी किताबों की दुकान देखी है... अगर आपने कभी सड़क किनारे प्रतियोगी परीक्षा की गाइड खरीदी है... अगर आपने कभी "प्रश्न बैंक", "सॉल्व्ड पेपर्स" या "वन वीक सीरीज" जैसी किताबें देखी हैं...तो बहुत संभव है कि वह मेरठ में छपी हो. धीरे-धीरे मेरठ उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा और मध्य भारत के बड़े हिस्से के लिए शैक्षणिक सामग्री का सबसे बड़ा स्रोत बन गया. यहां से निकलने वाली किताबें सिर्फ दुकानों तक नहीं पहुंचीं.


वे सपनों तक पहुंचीं. एक किताब की असली कीमत क्या होती है?

मेरठ के किसी प्रेस में छपी 80 या 100 रुपये की एक गाइड बुक बाजार में सामान्य वस्तु लग सकती है. लेकिन किसी गांव के छात्र के लिए वही किताब पहली सरकारी नौकरी का रास्ता बन सकती है. किसी किसान की बेटी के लिए वही किताब विश्वविद्यालय का दरवाजा खोल सकती है. किसी बेरोजगार युवक के लिए वही किताब परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का जरिया बन सकती है. यही वजह है कि मेरठ का प्रकाशन उद्योग केवल व्यापार नहीं है.

यह सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है.

आज भी क्यों खास है मेरठ?

डिजिटल युग आ चुका है.

मोबाइल पर नोट्स हैं.

यूट्यूब पर लेक्चर हैं.

एआई से जवाब मिल रहे हैं.

फिर भी मेरठ की मशीनें चल रही हैं. क्यों?

क्योंकि भारत का एक बड़ा हिस्सा आज भी किताब को सबसे भरोसेमंद शिक्षक मानता है. आज भी लाखों छात्र हाथ में किताब लेकर पढ़ना पसंद करते हैं. आज भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के कमरे मेरठ की छपी किताबों से भरे मिलते हैं.


एक शहर जो सपने छापता है. मेरठ की पहचान सिर्फ खेल के सामान, क्रांति या उद्योग से नहीं बनती. यह शहर उन लाखों अनदेखे सपनों से भी बनता है जिन्हें इसकी प्रिंटिंग मशीनें हर दिन कागज पर उतारती हैं. जब भी कोई छात्र किसी सस्ती गाइड बुक का पहला पन्ना खोलता है, शायद उसे यह पता नहीं होता कि वह किताब कहां छपी है. लेकिन कहीं न कहीं उस किताब के हर पन्ने में मेरठ मौजूद होता है.

स्याही की खुशबू में.

कागज की तहों में.

और उस उम्मीद में... कि शायद अगली नौकरी, अगला कॉलेज या अगली सफलता इसी किताब के किसी पन्ने में लिखी हो.