श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12
मेरठ को अक्सर एक औद्योगिक शहर या दिल्ली-एनसीआर के पास का एक तेज़ रफ्तार कस्बा भर समझ लिया जाता है. लेकिन असल में यह शहर अपने भीतर ऐसी परतें समेटे हुए है, जहां धूल भी अर्थव्यवस्था बन जाती है, कबाड़ से कला निकलती है और आवाज़ें संस्कृति का रूप ले लेती हैं.
यहां कुछ शब्द सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि पूरे जीवन, पेशे और सभ्यता का आईना हैं. यह कहानी उसी मेरठ की है- जहां रोजमर्रा की भाषा में इतिहास, मेहनत और जुगाड़ की पूरी दुनिया सांस लेती है.
न्यारिया- जहां धूल में भी सोना छुपा है
मेरठ की सर्राफा गलियों में एक शब्द अक्सर सुनाई देता है- 'न्यारिया'. बाहर से देखने में यह बस एक झाड़ू लगाने वाला काम लगता है, लेकिन असल में यह एक अदृश्य अर्थव्यवस्था का हिस्सा है. यह वो लोग होते हैं जो सुनारों की दुकानों और वर्कशॉप्स में गिरी महीन धूल को इकट्ठा करते हैं. वही धूल जिसमें सोने के बेहद सूक्ष्म कण छिपे होते हैं. आम आंख के लिए यह बेकार कचरा है, लेकिन न्यारिया के लिए यही कमाई का जरिया है.
वह इस धूल को साफ करता है, छानता है और फिर कई तकनीकी प्रक्रियाओं से गुजरकर उसमें छिपा सोना निकालता है. यह काम दिखने में छोटा है, लेकिन असल में यह बताता है कि मेरठ की अर्थव्यवस्था कितनी गहराई तक जमीन से जुड़ी है. जहां कुछ भी बेकार नहीं जाता.
मेरठ की कैंची- कबाड़ से बनी धारदार विरासत
मेरठ की 'कैंची' सिर्फ एक औजार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कारीगरी की पहचान है. यहां लोहे को सिर्फ आकार नहीं दिया जाता, बल्कि उसे नया जीवन दिया जाता है. पुराने स्प्रिंग, रेलवे का स्क्रैप और इस्तेमाल हो चुका स्टील- इन्हीं से यहां की मशहूर कैंचियां बनती हैं. भट्टी में तपाकर, हथौड़े से पीटकर और हाथ से धार देकर इन्हें तैयार किया जाता है. करीब 300 साल पुरानी इस परंपरा ने मेरठ को एक खास पहचान दी है. यही वजह है कि यहां की कैंचियों को GI टैग भी मिला है. यह सिर्फ धातु का काम नहीं है, बल्कि एक सोच है कि कबाड़ भी अगर सही हाथों में पहुंचे तो वह दुनिया की बेहतरीन चीज़ बन सकता है.
खड़ी बोली- खेतों से निकली आवाज़ जो आज हिंदी बन गई
अगर आज आप टीवी पर, अखबारों में या संसद में जो हिंदी सुनते हैं, उसकी जड़ें कहीं हैं तो वह मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धरती है. इसी क्षेत्र की बोली को खड़ी बोली कहा गया, जो धीरे-धीरे आधुनिक हिंदी की नींव बनी. यह भाषा न तो बहुत मीठी है, न बहुत भारी- यह सीधी, साफ और जमीन से जुड़ी हुई है.
19वीं सदी में जब साहित्य और प्रशासन पर फारसी और उर्दू का प्रभाव था, तब इसी क्षेत्र के विद्वानों ने खड़ी बोली को साहित्यिक रूप देना शुरू किया. आगे चलकर यही बोली हिंदी का आधार बनी. आज जो हिंदी हम पढ़ते और बोलते हैं, उसकी आत्मा कहीं न कहीं मेरठ की गलियों और गांवों की आवाज़ों में बसती है.
बाजा- पीतल से निकली शादी की धड़कन
मेरठ का एक और अनोखा संसार है- 'बाजा उद्योग'.
यहां बनने वाले ब्रास बैंड और वाद्ययंत्र सिर्फ संगीत के उपकरण नहीं हैं, बल्कि भारतीय शादियों की पहचान हैं. ट्यूबा, ट्रम्पेट और ढोल-नगाड़ों की यह दुनिया मेरठ के कारीगरों की मेहनत से चलती है. यहां पीतल को सिर्फ धातु नहीं माना जाता, बल्कि उसे आवाज़ में बदला जाता है. शादी-ब्याह की बारात में जो गूंज सुनाई देती है, उसका बड़ा हिस्सा मेरठ की इन छोटी-छोटी वर्कशॉप्स से निकलता है. यह परंपरा इस बात का सबूत है कि एक शहर कैसे औपनिवेशिक उपकरणों को अपनी संस्कृति में ढालकर पूरी तरह बदल सकता है.
मेरठ- जहां शब्द भी उद्योग हैं और आवाज़ भी पहचान
मेरठ को समझना सिर्फ उसके बाजार या इमारतों को देखना नहीं है. इसे समझने के लिए उसके शब्दों को सुनना पड़ता है.
'न्यारिया' बताता है कि यहां धूल भी कमाई है.
'कैंची' सिखाती है कि कबाड़ भी कला बन सकता है.
'खड़ी बोली' दिखाती है कि गांव की भाषा राष्ट्र की आवाज़ बन सकती है.
और 'बाजा' याद दिलाता है कि धातु भी संगीत बन सकती है.
असल में मेरठ एक शहर नहीं, एक जीवित व्यवस्था है- जहां काम, भाषा और संस्कृति रोज़ एक-दूसरे में घुलते रहते हैं.