भाग्य की फैक्ट्री है मेरठ! यहीं छपते हैं करोड़ों लोगों के पंचांग


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

सुबह के करीब 5 बजे होंगे. मेरठ शहर की कुछ पुरानी गलियों में अभी सूरज पूरी तरह नहीं निकला है, लेकिन कुछ प्रिंटिंग प्रेसों के भीतर मशीनों की आवाजें रात से ही गूंज रही हैं. बड़े-बड़े कागजों के रोल मशीनों में दौड़ रहे हैं. ताजा छपी स्याही की खुशबू हवा में घुली हुई है.

पहली नजर में यह किसी आम प्रिंटिंग प्रेस का नजारा लगता है. लेकिन यहां जो छप रहा है, वह सिर्फ कागज नहीं है. इन पन्नों पर लाखों-करोड़ों लोगों की आस्था, परंपरा और भविष्य की गणनाएं दर्ज हैं.

यहीं छप रहे हैं पंचांग

वही पंचांग, जिसे देखकर किसी घर में शादी की तारीख तय होती है. कोई नया कारोबार शुरू करने से पहले शुभ मुहूर्त खोजता है. कोई गृह प्रवेश की तिथि देखता है तो कोई व्रत और त्योहार का समय. यानी एक तरह से कहें तो मेरठ की इन मशीनों से सिर्फ किताबें नहीं निकलतीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों का कैलेंडर तैयार होता है.

जब मेरठ बना आस्था का प्रिंटिंग हब

मेरठ का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में खेल उद्योग, शिक्षा संस्थान या 1857 की क्रांति की याद आती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह शहर उत्तर भारत में धार्मिक साहित्य और पंचांग मुद्रण का भी एक बड़ा केंद्र है. हर साल यहां लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों प्रतियों में पंचांग, धार्मिक कैलेंडर, जन्मपत्रियां और ज्योतिष संबंधी पुस्तकें छापी जाती हैं. इनकी मांग उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहती. दिल्ली, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश तक इनका विशाल नेटवर्क फैला हुआ है. रेलवे स्टेशन के बुक स्टॉल से लेकर गांव के छोटे पुस्तक विक्रेता और मंदिरों तक, मेरठ में छपा पंचांग आसानी से पहुंच जाता है.

आखिर पंचांग में ऐसा क्या होता है?

पंचांग कोई साधारण कैलेंडर नहीं है.यह वैदिक ज्योतिष और खगोलीय गणनाओं पर आधारित एक विस्तृत वार्षिक दस्तावेज होता है. इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण की जानकारी दी जाती है. इसके साथ ही विवाह मुहूर्त, गृह प्रवेश, नामकरण, धार्मिक पर्व, ग्रहण, व्रत और कृषि कार्यों से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां भी दर्ज होती हैं. देश के करोड़ों परिवार आज भी जीवन के बड़े फैसले लेने से पहले पंचांग देखना जरूरी समझते हैं.

गणना कहीं और, छपाई मेरठ में

इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है. पंचांग में दर्ज होने वाली ज्योतिषीय गणनाएं अक्सर वाराणसी, हरिद्वार, उज्जैन और अन्य धार्मिक केंद्रों के विद्वान ज्योतिषाचार्य तैयार करते हैं. वे ग्रहों की स्थिति, नक्षत्रों और खगोलीय घटनाओं का सूक्ष्म अध्ययन करते हैं. लेकिन इन गणनाओं को करोड़ों लोगों तक पहुंचाने का जिम्मा मेरठ की प्रिंटिंग मशीनें संभालती हैं. यानी धार्मिक ज्ञान और औद्योगिक क्षमता का यह अनोखा संगम मेरठ में दिखाई देता है.

जब मशीनों से निकलता है 'भाग्य का कैलेंडर'

मेरठ के आधुनिक ऑफसेट प्रिंटिंग उद्योग में हाई-स्पीड मशीनें लगातार काम करती हैं. हजारों पन्ने हर घंटे छपते हैं. इन मशीनों से निकलने वाले पंचांग बाद में बंडलों में पैक होकर देशभर के अलग-अलग शहरों और कस्बों की ओर रवाना हो जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिन पंचांगों को कोई परिवार अपने घर के मंदिर में रखता है, वे अक्सर मेरठ की किसी प्रेस से निकलकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा तय करके वहां पहुंचे होते हैं.

सिर्फ आस्था नहीं, हजारों लोगों की आजीविका भी

पंचांग उद्योग सिर्फ धार्मिक महत्व नहीं रखता, बल्कि यह एक बड़ा आर्थिक तंत्र भी है. प्रिंटिंग प्रेस, पेपर सप्लायर, डिजाइनर, पैकेजिंग यूनिट, ट्रांसपोर्टर, थोक विक्रेता और खुदरा दुकानदार- सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी इस उद्योग से जुड़ी हुई है. त्योहारों के मौसम में यह कारोबार और अधिक सक्रिय हो जाता है.

डिजिटल युग में भी क्यों नहीं खत्म हुआ पंचांग?

मोबाइल ऐप्स और इंटरनेट के दौर में भी पंचांग की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. आज लोग Drik Panchang, AstroSage और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जानकारी जरूर देखते हैं, लेकिन घर में छपा हुआ पंचांग रखने की परंपरा अभी भी कायम है. कई परिवारों के लिए यह सिर्फ जानकारी का स्रोत नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का हिस्सा है. मेरठ: जहां परंपरा और तकनीक साथ-साथ चलती हैं

शायद यही मेरठ की सबसे बड़ी खासियत है.

एक तरफ सदियों पुराना वैदिक ज्ञान है, दूसरी तरफ आधुनिक ऑफसेट मशीनों की तेज रफ्तार. एक तरफ ग्रह-नक्षत्रों की गणना है, दूसरी तरफ करोड़ों प्रतियों की औद्योगिक छपाई. दोनों मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाते हैं, जहां आस्था और उद्योग एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं.

निष्कर्ष: यह शहर सिर्फ किताबें नहीं छापता

अगर ध्यान से देखा जाए तो मेरठ सिर्फ पंचांग नहीं छापता. यह उन तारीखों को आकार देता है जिनके आधार पर किसी की शादी तय होती है, कोई नया कारोबार शुरू होता है, कोई गृह प्रवेश करता है और कोई धार्मिक अनुष्ठान. इस मायने में मेरठ की प्रिंटिंग प्रेसें सिर्फ स्याही और कागज का काम नहीं करतीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी कहानियों को हर साल नया जीवन देती हैं. और शायद इसी वजह से मेरठ को "भाग्य की फैक्ट्री" कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा.