श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12
अगर कोई आपसे कहे कि भारत में एक ऐसी जगह भी है जहां जहरीले सांप इंसानों के बीच रहते हैं, लेकिन लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाते, तो शायद यकीन करना मुश्किल होगा. लेकिन मेरठ से करीब 30 किलोमीटर दूर स्थित परीक्षितगढ़ के बारे में स्थानीय लोगों की मान्यता कुछ ऐसी ही है.
यहां मौजूद श्रंगी ऋषि आश्रम के आसपास रहने वाले लोग दावा करते हैं कि सांपों का बसेरा होने के बावजूद आज तक किसी श्रद्धालु या किसान के साथ सर्पदंश की बड़ी घटना नहीं हुई. कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि अगर आसपास कहीं सांप मौजूद हो, तो उसका एहसास खुद-ब-खुद हो जाता है. वहीं बुजुर्गों के बीच एक और दिलचस्प मान्यता प्रचलित है कि राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय का नाम लेने भर से सांप पीछे हट जाते हैं.
इन दावों के पीछे विज्ञान क्या कहता है, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन परीक्षितगढ़ की पहचान सिर्फ इन मान्यताओं तक सीमित नहीं है. इसकी जड़ें महाभारत काल से जुड़ी उस कहानी में मिलती हैं, जिसने राजा परीक्षित, ऋषि श्रंगी और नागराज तक्षक को हमेशा के लिए भारतीय लोककथाओं का हिस्सा बना दिया.
जहां से शुरू होती है राजा परीक्षित की कहानी
परीक्षितगढ़ का नाम महाभारत काल के राजा परीक्षित के नाम पर पड़ा माना जाता है. राजा परीक्षित, वीर अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे. महाभारत युद्ध के बाद जब अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तब भगवान कृष्ण ने गर्भ में पल रहे परीक्षित की रक्षा की थी. कहा जाता है कि आगे चलकर वही बालक हस्तिनापुर का राजा बना. उनके शासनकाल को न्यायप्रिय और समृद्ध माना जाता है. लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में एक ऐसी घटना घटी, जिसने उनकी नियति बदल दी.
एक मृत सांप और एक ऐसा श्राप जिसने बदल दिया इतिहास
लोककथाओं के अनुसार एक दिन शिकार और भ्रमण के दौरान राजा परीक्षित जंगल में ऋषि शमीक के आश्रम पहुंचे. वे प्यासे थे और ऋषि से बात करना चाहते थे. लेकिन ऋषि गहन ध्यान में लीन थे और उन्होंने राजा की आवाज नहीं सुनी. राजा को लगा कि उनकी उपेक्षा की गई है. क्रोध में आकर उन्होंने पास पड़े एक मृत सांप को उठाया और ऋषि के गले में डाल दिया. जब यह बात ऋषि के पुत्र श्रंगी को पता चली, तो वे क्रोधित हो उठे. उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सातवें दिन तक्षक नामक नाग उन्हें डस लेगा और उनकी मृत्यु हो जाएगी.
मौत से बचने की कोशिश और तक्षक का आगमन
श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित को अपनी गलती का एहसास हुआ. कहा जाता है कि उन्होंने राजपाट अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया और मोक्ष प्राप्ति के लिए भागवत कथा सुनने का निर्णय लिया. लोकमान्यताओं के अनुसार वे गंगा तट स्थित शुक्रताल पहुंचे, जहां उन्होंने सात दिनों तक कथा श्रवण किया.
सातवें दिन जब उन्हें लगा कि संकट टल गया है, तभी तक्षक नाग साधु का वेश धारण करके उनके पास पहुंचा. कहानी कहती है कि कुछ ही क्षणों बाद उसने अपने वास्तविक रूप में आकर राजा को डस लिया. इसी सर्पदंश से राजा परीक्षित की मृत्यु हुई और उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ.
पिता की मौत का बदला लेने निकले जनमेजय
राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय अत्यंत क्रोधित हो गए. उन्होंने नागों के विनाश के लिए एक विशाल सर्प यज्ञ का आयोजन कराया. कथाओं के अनुसार यज्ञ की अग्नि में हजारों सांप खिंचे चले आ रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरी नाग जाति समाप्त हो जाएगी. तभी कुछ ऋषियों ने जनमेजय को क्रोध त्यागने और क्षमा का मार्ग अपनाने की सलाह दी. आखिरकार यज्ञ रोक दिया गया और नागों का पूर्ण विनाश टल गया. यही घटना आगे चलकर कई लोकमान्यताओं का आधार बनी.
क्यों कहा जाता है कि यहां सांप किसी को नहीं काटते?
परीक्षितगढ़ और श्रंगी ऋषि आश्रम के बारे में सबसे चर्चित मान्यता यही है कि यहां सांप इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि भगवान शिव ने इस क्षेत्र के नागों को ऐसा वरदान दिया था कि वे बिना कारण किसी मनुष्य को नहीं डसेंगे. आश्रम परिसर में गर्मियों और बरसात के मौसम में कई बार सांप दिखाई देते हैं, लेकिन श्रद्धालु इन्हें नुकसान नहीं पहुंचाते और सांप भी शांत बने रहते हैं. हालांकि इस मान्यता के समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन स्थानीय संस्कृति में इसका विशेष महत्व है.
पांच हजार साल पुराने वृक्ष की कहानी
श्रंगी ऋषि आश्रम में मौजूद एक प्राचीन गुल्लर का वृक्ष भी लोगों की आस्था का केंद्र है. स्थानीय मान्यता है कि इसी स्थान पर ऋषि शमीक और उनके पुत्र श्रंगी तपस्या किया करते थे. आश्रम में एक पुराना यज्ञकुंड, प्राचीन कुआं और कई धार्मिक अवशेष भी मौजूद हैं, जिन्हें महाभारत काल की स्मृतियों से जोड़कर देखा जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु इन स्थलों को इतिहास और आस्था के संगम के रूप में देखते हैं.
रहस्य, आस्था और इतिहास का अनोखा संगम
परीक्षितगढ़ की कहानी सिर्फ सांपों की नहीं है. यह कहानी है एक राजा की गलती, एक ऋषि के श्राप, एक पुत्र के प्रतिशोध और मोक्ष की तलाश की. आज भी जब कोई श्रद्धालु श्रंगी ऋषि आश्रम पहुंचता है, तो उसे सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं दिखता. उसे महसूस होता है कि वह उस कथा के बीच खड़ा है, जिसे भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों से सुनाती चली आ रही है. यही वजह है कि मेरठ का परीक्षितगढ़ आज भी इतिहास, पौराणिक मान्यताओं और रहस्यमयी लोककथाओं का ऐसा केंद्र बना हुआ है, जो हर आने वाले व्यक्ति के मन में कई सवाल छोड़ जाता है.