लोहा जितना तपता है, उतनी ही ताकत भरता है, सोने को जितनी आग लगे, वह उतना प्रखर निखरता है, हीरे पर जितनी धार लगे, वह उतना खूब चमकता है, अगर मेरठ जैसा बनना है तो सूरज जैसा जलना होगा... ये कहानी उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर की इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति की है...
...जो अक्सर स्पोर्ट्स सिटी या उद्योगों के शहर के तौर पर देखा जाता है, लेकिन इसकी एक ऐसी परत भी है जो कम लोगों को दिखती है. यह कहानी सिर्फ उत्पादन की नहीं, बल्कि उस जिद की है जिसने बिजली कटौती को अवसर में बदल दिया और एक पूरा इलेक्ट्रिकल इकोसिस्टम खड़ा कर दिया.
यह वह दौर था जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बिजली भरोसे की चीज़ नहीं थी. कभी लाइन आती थी, कभी घंटों गायब हो जाती थी. ऊपर से वोल्टेज का उतार-चढ़ाव छोटे-बड़े हर उपकरण को नुकसान पहुंचा देता था. शहरों में यह परेशानी थी, लेकिन मेरठ की गलियों में यह एक नई सोच का बीज बन गई.
कैसे बढ़ा इनोवेशन?
1980-90 के दशक में मेरठ के छोटे वर्कशॉप्स में काम करने वाले तकनीशियन और इलेक्ट्रिशियन सिर्फ ग्राहक की समस्या हल नहीं कर रहे थे, वे एक नई तकनीकी भाषा गढ़ रहे थे. विदेश से आए ट्रांसफॉर्मर, स्टेबलाइजर और इन्वर्टर महंगे थे और भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से कमजोर भी.
ऐसे में स्थानीय कारीगरों ने उन्हें खोलकर समझा, बिगाड़कर सुधारा और फिर अपने तरीके से नया रूप देना शुरू किया. यहीं से जन्म हुआ उस लोकल टेक्नोलॉजी इकोसिस्टम का, जिसे आज लोग अनौपचारिक रूप से 'मेरठ इलेक्ट्रिकल क्लस्टर' के नाम से जानते हैं. यह सिर्फ कॉपी नहीं थी. यह री-इंजीनियरिंग थी. भारतीय बिजली व्यवस्था के हिसाब से बनाई गई टेक्नोलॉजी.
गलियों से उठकर बना इंडस्ट्री मॉडल
मेरठ के कारीगरों ने स्टेबलाइजर और इन्वर्टर को सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं रहने दिया. उन्होंने इसे एक भरोसे की चीज बना दिया. ऐसा भरोसा जो गांव के घरों, दुकानों और छोटे कारखानों में सबसे जरूरी बन गया. भारी कॉपर वायरिंग, लोकल रिपेयर नेटवर्क और सस्ते में मेंटेन होने वाली डिजाइन ने इस उद्योग को अलग पहचान दी. धीरे-धीरे छोटे वर्कशॉप्स एक बड़े अनऑर्गनाइज्ड लेकिन मजबूत नेटवर्क में बदल गए.
'इकोनॉमी ऑफ नेसेसिटी' ने मेरठ को 'चमका' दिया
मेरठ की यह पूरी कहानी एक सिद्धांत में समेटी जा सकती है- Economy of Necessity. यह वह अर्थव्यवस्था है जो किसी योजना से नहीं, बल्कि जरूरत से पैदा होती है. यहां कारीगरों ने नौकरी का इंतजार नहीं किया, उन्होंने घरों में ही छोटी यूनिट्स बना लीं. किसी ने स्टेबलाइजर बनाया, किसी ने रिपेयरिंग सिस्टम खड़ा किया, तो किसी ने इलेक्ट्रिकल पार्ट्स की सप्लाई लाइन तैयार कर दी. यह मॉडल आज भी मेरठ की पहचान है- जहां MSME सिर्फ शब्द नहीं, जीवन का तरीका है.
आज का मेरठ- लोकल से ग्लोबल तक
आज यह पूरा इलेक्ट्रिकल और ट्रांसफॉर्मर क्लस्टर एक संगठित उद्योग का रूप ले चुका है. यहां बने उपकरण सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कई देशों तक सप्लाई होते हैं. साथ ही, नई इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं ने इस इंडस्ट्री को एक नया रास्ता दिया है- गंगा एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ RRTS (नमो भारत) और औद्योगिक क्लस्टर डेवलपमेंट ने इस लोकल उद्योग को राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार से जोड़ दिया है.
IMLC और नया औद्योगिक मेरठ
खरखौदा–बिजौली क्षेत्र में बन रहा इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर (IMLC) अब इस कहानी का अगला अध्याय है. यह सिर्फ एक इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक पूरी वैल्यू चेन को एक जगह लाने की कोशिश है. कच्चे माल से लेकर तैयार प्रोडक्ट तक. स्पोर्ट्स गुड्स, इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट और अन्य मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को यहां एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर लाया जा रहा है.
अंधेरे ने नहीं, जिद ने रोशनी बनाई
मेरठ की इलेक्ट्रॉनिक्स कहानी किसी सरकारी योजना से शुरू नहीं हुई थी. यह उस समय की कहानी है जब सिस्टम कमजोर था, लेकिन लोग मजबूत थे. यह शहर दिखाता है कि असली औद्योगिक क्रांति कभी-कभी फैक्ट्री प्लानिंग से नहीं, बल्कि एक छोटे वर्कशॉप में टपकती बिजली और उससे जूझते कारीगरों की सोच से शुरू होती है. मेरठ ने साबित किया है - यहां अंधेरा सिर्फ समस्या नहीं था, वह अवसर था जिसने रोशनी बेचने का उद्योग खड़ा कर दिया.