महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित पर्व है. इस दिन पूरा वातावरण और श्रद्धालु शिवमय हो जाते हैं. हर तरफ “हर हर महादेव” की गूंज सुनाई देती है.
फागुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर कई मान्यताएं हैं. कहते हैं कि भगवान शिव सबसे पहले शिवलिंग के स्वरूप में प्रकट हुए थे. शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में हुआ था, जिसका ना कोई आदि था और ना अंत.
एक मान्यता के अनुसार, महाशिवरात्रि पर ही भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ, यानी भगवान शिव ने वैराग्य छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया.
शिव के विभिन्न रूप हैं और उनके अनेक नाम हैं. शिव ग्राम के गजभर चबूतरे से लेकर रामेश्वरम के भव्य मंदिर तक पूजनीय हैं. शिव अपने भक्तों पर ना तो क्रोध करते हैं और ना हिंसा, क्योंकि वे हमेशा मंगलकारी और कृपालु हैं.
शिव के कुछ प्रमुख नाम और अर्थ:
पिनाकी: शत्रुओं के विनाश के लिए धनुष धारण करने के कारण
कपाली: ब्रह्मा का सिर काटकर उसे धारण करने के कारण
सदाशिव: धन, पुत्र और सुख-सौभाग्य देने वाले
आशुतोष: शीघ्र प्रसन्न होने वाले
अंबिकेश्वर: मां पार्वती के पति होने के कारण
सर्व भूतेश्वर: सर्वशक्तिमान, सर्वेश और सृष्टि संहारक
महाकाल: समय के स्वामी और मुक्ति के दाता
शिव विश्वनाथ, सोमनाथ, केदारनाथ, वैद्यनाथ, रामेश्वरम, मल्लिकार्जुन, भीमा शंकर, त्रंबकेश्वर, ओमकारेश्वर, नागेश्वर, घुश्मेश्वर, पशुपतिनाथ- ये सभी शिव के रूप हैं.
शिव हर स्थिति में स्थिर हैं, सत्य हैं, सुंदर हैं और अतुलनीय हैं.
शुक्राचार्य और संजीवनी मंत्र की कथा
एक बार शुक्राचार्य ने भगवान शिव की तपस्या की. प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें संजीवनी मंत्र दिया, जिससे कोई भी बीमारी या चोट ठीक हो सकती थी. लेकिन देवताओं को चिंता हुई कि शुक्राचार्य इस शक्ति का उपयोग युद्ध में घायल दानवों को ठीक करने में कर रहे थे. शिव ने बाद में उन्हें नियंत्रित किया और ब्रह्मांड में संतुलन कायम हुआ.
शिव भोला भंडारी हैं क्योंकि वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं. इसलिए कहा गया है कि “कण कण में शंकर हैं. शिव हैं सत्य, शिव हैं आनंद.”