भारत में मंदिरों की बात हो तो आंखों के सामने एक जैसी तस्वीर उभरती है. घंटियों की आवाज, अगरबत्ती की खुशबू, फूलों की मालाएं, दूध, फल, मिठाइयां और पंचामृत का भोग. बचपन से हमने यही देखा और सीखा कि भगवान को सात्विक चीजें ही अर्पित की जाती हैं.
लेकिन कल्पना कीजिए... अगर कोई आपसे कहे कि भारत में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां भगवान को प्रसाद के रूप में शराब चढ़ाई जाती है. उनके चरणों में गांजा, भांग, चिलम, सिगरेट, बीड़ी और तंबाकू अर्पित किए जाते हैं. इतना ही नहीं, पूजा पूरी होने के बाद इन्हीं चीजों का एक हिस्सा प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा भी जाता है. पहली बार सुनने पर यह बात किसी अफवाह जैसी लग सकती है. लेकिन मध्य प्रदेश के उज्जैन में यह परंपरा सदियों से चली आ रही आस्था का हिस्सा है.
जहां भगवान के सामने रखी जाती हैं शराब की बोतलें
महाकाल की नगरी उज्जैन केवल ज्योतिर्लिंग के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है. इसी शहर में भगवान शिव के उग्र स्वरूप माने जाने वाले काल भैरव का मंदिर भी है, जिसकी पहचान पूरे देश में अपनी अनोखी परंपरा की वजह से है. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सामान्य प्रसाद के साथ-साथ शराब की बोतलें भी लेकर पहुंचते हैं. कोई व्हिस्की चढ़ाता है, कोई रम, कोई देशी शराब. कई भक्त भांग, गांजा, चिलम, बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू भी अर्पित करते हैं. पहली नजर में यह दृश्य किसी नए व्यक्ति को चौंका सकता है, लेकिन यहां मौजूद श्रद्धालुओं के लिए यह पूरी श्रद्धा और विश्वास का विषय है.
भैरव अष्टमी पर बदल जाती है पूरे उज्जैन की तस्वीर
वैसे तो पूरे साल काल भैरव मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन भैरव अष्टमी के दौरान यहां का माहौल बिल्कुल अलग होता है. देश के अलग-अलग राज्यों से हजारों भक्त उज्जैन पहुंचते हैं. मंदिर परिसर में लंबी कतारें लगती हैं. हर कोई अपनी श्रद्धा के अनुसार भैरव बाबा के लिए अलग-अलग भोग लेकर आता है. सिर्फ शराब ही नहीं, बल्कि भांग, गांजा, चिलम, बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू की भी अनेक किस्में भगवान को अर्पित की जाती हैं. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और हर साल इसमें शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है.
हर साल बढ़ता जा रहा है भोग का दायरा
स्थानीय परंपराओं के अनुसार समय के साथ भैरव बाबा को चढ़ाए जाने वाले भोग का स्वरूप लगातार बड़ा हुआ है. अब श्रद्धालु केवल एक-दो प्रकार की वस्तुएं नहीं लाते, बल्कि देशी और विदेशी शराब के कई ब्रांड, अलग-अलग प्रकार की सिगरेट, बीड़ी, तंबाकू, भांग और अन्य सामग्री भी अर्पित करते हैं. भैरव अष्टमी के अवसर पर मंदिर परिसर एक तरह से लोकआस्था और तांत्रिक परंपरा का विशाल संगम बन जाता है.
आखिर भगवान भैरव को ही क्यों चढ़ाई जाती हैं ये चीजें?
इस सवाल का जवाब शैव और तांत्रिक परंपरा में मिलता है. काल भैरव को भगवान शिव का उग्र, रक्षक और तांत्रिक स्वरूप माना जाता है. तंत्र साधना में भैरव की विशेष उपासना का उल्लेख मिलता है. माना जाता है कि वे उन सभी सांसारिक सीमाओं से परे हैं, जिन्हें सामान्य लोग धर्म और पूजा की परिभाषा मानते हैं.
मंदिर के एक पुजारी बताते हैं, "भैरव बाबा तंत्र के देवता हैं. वे सांसारिक नियमों से परे हैं. जो सामान्य बुद्धि से समझ नहीं आता, कई बार वही आस्था का सबसे गहरा रूप होता है." इसी विश्वास के कारण यहां की पूजा-पद्धति दूसरे मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है.
भोग के बाद बन जाता है प्रसाद
इस मंदिर की सबसे अनोखी बात सिर्फ भोग चढ़ाना नहीं, बल्कि उसके बाद की परंपरा भी है. मंदिर में भगवान को अर्पित की गई सामग्री का एक हिस्सा बाद में प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है. भक्त इसे भैरव बाबा का आशीर्वाद मानकर ग्रहण करते हैं. यही वजह है कि इस परंपरा को देखने के लिए देश ही नहीं, विदेशों से भी लोग उज्जैन पहुंचते हैं.
आस्था और रहस्य... दोनों साथ चलते हैं
काल भैरव मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं है. यह भारतीय लोकविश्वास, तांत्रिक परंपरा और सांस्कृतिक विविधता का भी जीवंत उदाहरण है. यहां आने वाले लोगों के लिए शराब या चिलम कोई नशे की वस्तु नहीं, बल्कि एक धार्मिक अर्पण है. सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बिना किसी बदलाव के निभाई जा रही है.
उज्जैन का यह मंदिर सिर्फ दर्शन नहीं, एक अनुभव है. भारत की धार्मिक परंपराएं जितनी विविध हैं, उतनी ही रहस्यमयी भी हैं. कहीं भगवान को खीर का भोग लगता है, कहीं गुड़ और नारियल चढ़ता है, तो कहीं काल भैरव के चरणों में शराब की बोतलें और चिलम रखी जाती है. यही विविधता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान भी है.
महाकाल की नगरी का यह अनोखा मंदिर हर उस व्यक्ति को सोचने पर मजबूर कर देता है, जो मानता है कि पूजा का केवल एक ही तरीका होता है. यहां आकर एहसास होता है कि आस्था का स्वरूप जगह-जगह बदल सकता है, लेकिन श्रद्धा की गहराई हमेशा एक जैसी रहती है. यही कारण है कि उज्जैन का काल भैरव मंदिर आज भी रहस्य, परंपरा और लोकविश्वास का ऐसा संगम माना जाता है, जो हर साल लाखों लोगों को अपनी ओर खींच लाता है.