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कहानी मेवाड़ के असली राजा भगवान एकलिंगजी की, पढ़िए बप्पा रावल से जुड़ी रहस्यमयी स्टोरी के बारे में


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

राजस्थान… जहां रेत का हर कण इतिहास की कहानी सुनाता है. यहां की हवाओं में सिर्फ तलवारों की टकराहट और वीरों की गाथाएं ही नहीं, बल्कि आस्था की ऐसी गहराई भी बसती है जो सदियों से लोगों को जोड़ती आई है. इन्हीं कहानियों के बीच एक नाम बार-बार उभरकर सामने आता है. भगवान एकलिंगजी. एक ऐसा देव, जिन्हें मेवाड़ में सिर्फ पूजा नहीं जाता, बल्कि आज भी 'राजा' माना जाता है.

उदयपुर से कुछ दूरी पर, अरावली की शांत पहाड़ियों के बीच बसा एकलिंगजी मंदिर बाहर से भले ही पत्थरों का बना एक स्थापत्य लगे, लेकिन जैसे ही आप इसके इतिहास में उतरते हैं, यह एक जीवंत सत्ता का रूप ले लेता है-जहां भगवान ही शासक हैं और इंसान सिर्फ उनके सेवक.

भगवान एकलिंगजी कौन हैं और क्यों कहलाते हैं मेवाड़ के असली शासक?

मेवाड़ की परंपरा बाकी राजघरानों से बिल्कुल अलग रही है. यहां कभी भी किसी महाराणा ने खुद को 'राजा' नहीं कहा. वजह? क्योंकि इस गद्दी का असली मालिक कोई इंसान नहीं, बल्कि भगवान एकलिंगजी हैं. महाराणा खुद को सिर्फ 'दीवान' यानी प्रतिनिधि मानते हैं. जो भगवान के आदेश पर राज्य चलाता है. यही वजह है कि यहां सत्ता हमेशा धर्म से जुड़ी रही.

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'एकलिंगजी' नाम भी अपने आप में एक दर्शन समेटे हुए है- 'एक' यानी एकत्व और 'लिंग' यानी शिव का निराकार स्वरूप. मंदिर के गर्भगृह में विराजमान चार मुख वाला काले संगमरमर का शिवलिंग सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि शिव की सर्वव्यापकता का प्रतीक है. जो चारों दिशाओं में नजर रखते हैं, मानो पूरे मेवाड़ की रक्षा कर रहे हों. यह मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि मेवाड़ राजवंश की आत्मा रहा है, जहां पीढ़ियों से राजा-महाराणा अपने हर बड़े फैसले से पहले आशीर्वाद लेने आते रहे.


मेवाड़ की शुरुआत कैसे हुई और एकलिंगजी से इसका क्या रिश्ता है?

कहानी शुरू होती है एक ऐसे समय से, जब मेवाड़ की धरती पर संकट छाया हुआ था. एक विनाशकारी हमले के बाद रानी पुष्पावती ने एक बच्चे को जन्म दिया. गुहिल. यही गुहिल आगे चलकर गुहिला वंश की नींव बने. बचपन भीलों के बीच बीता, लेकिन किस्मत ने उन्हें एक योद्धा बनाया. धीरे-धीरे उन्होंने अपनी शक्ति से सत्ता स्थापित की और नागदा को राजधानी बनाया. फिर इस कहानी में एंट्री होती है एक ऐसे नाम की, जिसने मेवाड़ की पहचान हमेशा के लिए बदल दी.

बप्पा रावल. उन्हें सिर्फ एक राजा नहीं, बल्कि मेवाड़ का असली संस्थापक माना जाता है. कहते हैं, एक दिन बप्पा रावल की मुलाकात ऋषि हरीत से हुई. ऋषि ने उन्हें भगवान एकलिंगजी की महिमा बताई और आदेश दिया कि वे उनकी आराधना करें और मंदिर बनवाएं. बप्पा रावल ने यही किया और उसी दिन से मेवाड़ की सत्ता भगवान को समर्पित हो गई. राजा अब शासक नहीं, बल्कि भगवान के सेवक बन गए.

क्या एकलिंगजी मंदिर ने हमलों और विनाश का दौर भी देखा है?

इतिहास हमेशा शांत नहीं रहता…और एकलिंगजी मंदिर भी इससे अछूता नहीं रहा. मध्यकाल में कई बार इस मंदिर पर आक्रमण हुए. दुश्मनों ने इसे तोड़ने की कोशिश की, इसकी आस्था को खत्म करने की कोशिश की. लेकिन हर बार मेवाड़ के शासक दीवार बनकर खड़े हो गए. मंदिर टूटा, लेकिन आस्था नहीं टूटी. हर बार इसे फिर से बनाया गया और पहले से ज्यादा भव्य रूप में. 971 ईस्वी का शिलालेख और 1460 ईस्वी का कुंभलगढ़ अभिलेख आज भी इस बात के गवाह हैं कि एकलिंगजी सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि मेवाड़ की आत्मा है, जिसे कोई भी ताकत खत्म नहीं कर सकी.


इस मंदिर का धार्मिक और दार्शनिक रहस्य क्या है?

एकलिंगजी मंदिर में सिर्फ पूजा नहीं होती, यहां दर्शन होता है. एक गहरे आध्यात्मिक विज्ञान का. यह मंदिर शैव धर्म की उस परंपरा से जुड़ा है, जिसे पाशुपत संप्रदाय कहा जाता है. इस विचारधारा में शिव को सिर्फ देवता नहीं, बल्कि सृष्टि का मूल माना गया है. जिससे सब कुछ शुरू होता है और जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है. मंदिर की बनावट भी कोई साधारण वास्तुकला नहीं है. गर्भगृह को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया है. जहां से सृष्टि की शुरुआत होती है. पूरा मंदिर एक विराट पुरुष की तरह है. शिखर उसका सिर, दीवारें उसका शरीर और आधार उसके पैर. यह सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि एक जीवित ऊर्जा का केंद्र है.

बप्पा रावल और एकलिंगजी की कहानी में ऐसा क्या रहस्य छिपा है?

कभी-कभी इतिहास और आस्था एक ऐसी कहानी रच देते हैं, जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कहते हैं, बप्पा रावल जब गाय चराते थे, तो उन्होंने एक अजीब दृश्य देखा- एक गाय रोज एक ही जगह पर जाकर अपने आप दूध बहा देती थी. जिज्ञासा हुई… उन्होंने उस जगह को खोदा… और वहां से एक शिवलिंग प्रकट हुआ. उसी समय ऋषि हरीत प्रकट हुए. उन्होंने बताया कि यह कोई साधारण स्थान नहीं, बल्कि भगवान एकलिंगजी का धाम है. ऋषि ने बप्पा को आशीर्वाद दिया- 'तुम सिर्फ राजा नहीं बनोगे, बल्कि एक महान शासक बनोगे.' यहीं से शुरू हुई वह परंपरा, जिसमें सत्ता का केंद्र इंसान नहीं, बल्कि भगवान बने.

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क्या शैव धर्म और पाशुपत संप्रदाय ने मेवाड़ को प्रभावित किया?

अगर आप मेवाड़ के इतिहास को समझना चाहते हैं, तो शैव धर्म को समझना जरूरी है. इसकी जड़ें इतनी पुरानी हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता तक पहुंचती हैं. वैदिक ग्रंथों में रुद्र का उल्लेख मिलता है, जो बाद में शिव के रूप में पूजे गए. 600 से 1000 ईस्वी के बीच शैव धर्म ने यहां अपनी गहरी पकड़ बना ली. पाशुपत संप्रदाय, जिसे लकुलीश से जोड़ा जाता है, ने इस क्षेत्र की धार्मिक सोच को पूरी तरह बदल दिया. एकलिंगजी और उसके आसपास मिले अभिलेख बताते हैं कि यहां पाशुपत साधु न सिर्फ साधना करते थे, बल्कि मंदिर की व्यवस्था और अनुष्ठानों का संचालन भी संभालते थे.

आज भी मंदिर में कौन-कौन सी परंपराएं जीवित हैं?

समय बदलता है, लेकिन कुछ परंपराएं सदियों तक जिंदा रहती हैं- एकलिंगजी मंदिर इसका जीता-जागता उदाहरण है. सुबह की पहली किरण के साथ ही यहां पूजा शुरू हो जाती है. घंटियों की आवाज, मंत्रों की गूंज और धूप की खुशबू पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है. महाशिवरात्रि के दिन यहां ऐसा लगता है जैसे पूरा मेवाड़ एक जगह इकट्ठा हो गया हो. भगवान का भव्य श्रृंगार होता है और हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं. 

इसके अलावा गुरु पूर्णिमा, अन्नकूट और गणगौर जैसे त्योहार भी पूरे उत्साह के साथ मनाए जाते हैं. लोक संगीत, नृत्य और भजन-कीर्तन के साथ यहां की परंपराएं सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव भी बन जाती हैं. दाल-बाटी-चूरमा, घेवर और जलेबी जैसे स्वाद इस माहौल को और भी खास बना देते हैं.

आज के समय में मेवाड़ राजपरिवार और एकलिंगजी का रिश्ता कैसा है?

इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं रहता… कुछ परंपराएं आज भी सांस लेती हैं. आज भी मेवाड़ का राजपरिवार उसी परंपरा को निभा रहा है, जो सदियों पहले शुरू हुई थी. महाराणा खुद को भगवान का दीवान मानते हैं. एक सेवक, जो सिर्फ जिम्मेदारी निभा रहा है. राजकीय अनुष्ठान, शोभायात्राएं और पारंपरिक समारोह आज भी उसी श्रद्धा और नियम के साथ किए जाते हैं. मंदिर का प्रबंधन भी राजपरिवार के पास है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि इसकी विरासत, इसकी आस्था और इसकी पहचान आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे. यह कहानी सिर्फ एक मंदिर की नहीं है… यह उस विश्वास की कहानी है, जहां सत्ता से ऊपर आस्था है, और जहां एक देवता आज भी एक पूरे राज्य का राजा माना जाता है.