कहानी मेरठ के उस 'स्तंभ' की जो आज दिल्ली में करता है राज


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

मेरठ की धरती सिर्फ एक आधुनिक शहर नहीं, बल्कि इतिहास की उन गहरी परतों का हिस्सा रही है, जहां समय खुद पत्थरों में दर्ज हो गया था. मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में जब पूरा भारतीय उपमहाद्वीप एक संगठित साम्राज्य के रूप में आकार ले रहा था, तब मेरठ भी उस वैचारिक और प्रशासनिक नेटवर्क का एक अहम हिस्सा था. यहां स्थापित अशोक का एक विशाल बलुआ पत्थर का स्तंभ केवल एक निर्माण नहीं था, बल्कि 'धम्म' यानी नैतिक शासन और बौद्ध विचारधारा का जीवंत प्रतीक था.

यह स्तंभ लगभग 32 फीट ऊंचा था, जिस पर ब्राह्मी लिपि में अशोक के संदेश अंकित थे. ये संदेश किसी राजा की ताकत का प्रदर्शन नहीं थे, बल्कि एक ऐसे शासक की आत्मस्वीकृति थे जिसने युद्ध की हिंसा के बाद शांति और करुणा को अपना मार्ग चुना था. मेरठ की उस प्राचीन भूमि पर यह स्तंभ लोगों को नैतिक जीवन, अनुशासन और सह-अस्तित्व का संदेश देता रहा, लेकिन इतिहास हमेशा स्थिर नहीं रहता…वह बहता है, बदलता है और कभी-कभी किसी और दिशा में अपनी पहचान छोड़ जाता है.


जब मेरठ से उठा एक स्तंभ और दिल्ली की पहचान बन गया

14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के शासक फिरोज शाह तुगलक की नजर इस ऐतिहासिक स्तंभ पर पड़ी. कहा जाता है कि वह इसकी भव्यता और संदेशों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इसे अपनी राजधानी में स्थापित करने का निर्णय ले लिया. यह निर्णय सिर्फ एक स्थानांतरण नहीं था, बल्कि सत्ता और विरासत को अपने केंद्र में लाने की एक ऐतिहासिक महत्वाकांक्षा भी थी.

स्तंभ को मेरठ से निकालना आसान नहीं था. इसे टूटने से बचाने के लिए विशेष तरीके से लपेटा गया, भारी व्यवस्था की गई और हजारों लोगों की मेहनत इसमें लगाई गई. इसे एक विशाल 42-पहियों वाली गाड़ी पर रखा गया और फिर यमुना नदी के रास्ते नावों से दिल्ली तक पहुंचाया गया. जिस स्तंभ ने सदियों तक मेरठ की पहचान को जिया था, वह धीरे-धीरे दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहर बन गया.


दिल्ली में नया जीवन, मेरठ में छूटी हुई विरासत

दिल्ली के रिज क्षेत्र में आज जो 'दिल्ली-मेरठ स्तंभ' के नाम से जाना जाता है, वह वही ऐतिहासिक धरोहर है जो कभी मेरठ की जमीन पर खड़ा था. वहां यह केवल एक पत्थर का स्तंभ नहीं, बल्कि इतिहास का वह अध्याय है जिसने शहरों की सीमाएं पार कर लीं. समय के साथ एक विस्फोट में इसे नुकसान भी पहुंचा, लेकिन बाद में इसे पुनः संरक्षित किया गया. आज यह स्तंभ दिल्ली विश्वविद्यालय और हिंदू राव अस्पताल के पास खड़ा है, जहां हर दिन लोग इसे देखते हैं, तस्वीरें लेते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी असली जड़ें मेरठ की मिट्टी में हैं.

मेरठ की वह विरासत जो इतिहास में बिखर गई

मेरठ का यह स्तंभ केवल पत्थर का टुकड़ा नहीं था, बल्कि उस दौर की सोच, संस्कृति और शासन व्यवस्था का प्रतीक था. यह उस समय की कहानी कहता है जब शिलालेख केवल जानकारी नहीं, बल्कि विचारों का प्रसार हुआ करते थे. विडंबना यह है कि जिस शहर ने इस धरोहर को जन्म दिया, उसकी अपनी पहचान में यह स्तंभ अब लगभग एक “भूली हुई स्मृति” बन चुका है. इतिहास के पन्नों में यह मेरठ से दिल्ली की यात्रा तो दर्ज है, लेकिन जमीन पर उसकी उपस्थिति कहीं खो सी गई है.


पत्थर नहीं, एक सभ्यता का विस्थापन

मेरठ के अशोक स्तंभ की कहानी सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि सत्ता, संस्कृति और स्मृति का एक गहरा अध्याय है. यह हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं होता, वह स्थानों की मिट्टी में भी सांस लेता है. आज जब हम दिल्ली के रिज पर खड़े उस स्तंभ को देखते हैं, तो वह केवल मौर्य काल की विरासत नहीं दिखाता… वह यह भी बताता है कि कभी मेरठ इस इतिहास का केंद्र था और उसकी पहचान पत्थरों में नहीं, बल्कि समय में दर्ज थी.