मेरठ का आलमगीरपुर: हड़प्पा सभ्यता की आखिरी चौकी और महाभारत काल का कनेक्शन


श्रेणी :अन्य | लेखक : Admin | दिनांक : 30 September 2022 04:12

मेरठ की सुबह हमेशा शोर से खुलती है. सड़कों पर दौड़ते वाहन, धूल उड़ाती गलियां और तेजी से फैलती कॉलोनियां. लेकिन इसी शहर से कुछ किलोमीटर दूर हिंडन नदी के किनारे पहुंचते ही माहौल बदल जाता है. वहां एक अजीब सी खामोशी है. खेतों के बीच बसा आलमगीरपुर बाहर से एक साधारण गांव लगता है, लेकिन इसकी मिट्टी के नीचे हजारों साल पुरानी ऐसी कहानी दबी है, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी.

जब मैं आलमगीरपुर के उस टीले के पास खड़ा था, जहां 1958 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने खुदाई शुरू की थी, तो यह कल्पना करना मुश्किल नहीं था कि कभी यहां से बैलगाड़ियों के कारवां गुजरते होंगे. मिट्टी की ईंटों से बनी चौकियों पर प्रहरी खड़े रहते होंगे और शहर के प्रवेश द्वार पर आने-जाने वालों पर नजर रखी जाती होगी. यही वह जगह है, जिसे आज सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे पूर्वी चौकी माना जाता है. 

मेरठ के आलमगीरपुर गांव का किस्सा

आलमगीरपुर सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि कांस्य युग की उस दुनिया का आखिरी पूर्वी दरवाजा है, जहां से हड़प्पा सभ्यता का विस्तार गंगा-यमुना दोआब तक पहुंचता दिखाई देता है. मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे बसे इस स्थल ने इतिहासकारों की उस सोच को बदल दिया, जिसमें माना जाता था कि हड़प्पा संस्कृति केवल सिंधु नदी के आसपास तक सीमित थी. 1958 और 1959 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहां खुदाई की. खुदाई में मिले अवशेषों ने साफ कर दिया कि यहां कभी हड़प्पाई संस्कृति की मजबूत मौजूदगी थी. मिट्टी के बर्तन, चूड़ियां, मनके, तांबे के उपकरण और टेराकोटा से बनी वस्तुएं इस बात के गवाह बने.



कैसी थी हड़प्पावासियों की यह चौकी?

कल्पना कीजिए…लगभग 2500 ईसा पूर्व का समय. हिंडन नदी के किनारे ऊंचे चबूतरे पर मिट्टी और पकी ईंटों से बनी निगरानी चौकी खड़ी है. दूर से आने वाले व्यापारी अपने बैलगाड़ियों वाले कारवां रोकते हैं. शहर के प्रवेश द्वार पर पहरेदार उनकी जांच करते हैं. कुछ लोग सामान का हिसाब रखते हैं, तो कुछ कर वसूली में लगे हैं. यह चौकियां केवल सुरक्षा के लिए नहीं थीं. इनके आसपास खुले स्थान संभवतः व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र रहे होंगे. यहां आने वाले व्यापारी कुओं और स्नानागारों का इस्तेमाल करते होंगे. यही वजह है कि हड़प्पा सभ्यता को केवल कृषि आधारित समाज नहीं, बल्कि एक संगठित शहरी सभ्यता माना जाता है.



इन ईंटों में ऐसा क्या खास था?

आलमगीरपुर में मिले निर्माण अवशेष बताते हैं कि हड़प्पावासी निर्माण कला में बेहद उन्नत थे. यहां इस्तेमाल हुई ईंटें 1:2:4 के मानकीकृत अनुपात में बनाई जाती थीं. यानी लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई का संतुलन ऐसा कि दीवारें मजबूत भी रहें और निर्माण व्यवस्थित भी दिखे. धूप में सुखाई गई मिट्टी की ईंटों के साथ-साथ भट्ठों में पकी ईंटों का भी इस्तेमाल हुआ था. यही तकनीक मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में भी दिखाई देती है.

आलमगीरपुर की खुदाई में आखिर मिला क्या था?

खुदाई में मिले अवशेषों ने पुरातत्वविदों को चौंका दिया था. यहां से विशिष्ट हड़प्पाई मृदभांड, चूड़ियां, मनके, मिट्टी की मुहरें, टेराकोटा केक और बैलगाड़ी जैसी आकृतियां मिलीं. इसके अलावा कपास की खेती के भी प्रमाण मिले, जो बताते हैं कि यहां आर्थिक गतिविधियां काफी विकसित थीं. स्थानीय लोग इस जगह को “परशुराम का खेड़ा” या “परशुराम का टीला” भी कहते हैं. माना जाता है कि इस स्थल की पहचान सबसे पहले भारत सेवक समाज ने की थी, जिसके बाद एएसआई ने विस्तृत खुदाई करवाई.



मेरठ में महाभारत काल और हड़प्पा सभ्यता का कनेक्शन

सबसे दिलचस्प बात यही है. आलमगीरपुर से ज्यादा दूर नहीं है हस्तिनापुर- वही जगह जिसे महाभारत काल में कुरु साम्राज्य की राजधानी माना जाता है. एक तरफ कांस्य युग की हड़प्पाई संस्कृति के निशान हैं, तो दूसरी तरफ वैदिक और महाकाव्य काल की शुरुआत. इतिहासकार मानते हैं कि मेरठ का यह इलाका भारत की सभ्यताओं के संक्रमण का सबसे अहम भूगोल रहा है. यानी यहां वह दौर भी मौजूद है, जहां हड़प्पा सभ्यता धीरे-धीरे खत्म हो रही थी और वैदिक समाज आकार ले रहा था.



आज क्यों खास है आलमगीरपुर?

आज आलमगीरपुर का नाम शायद बड़े पर्यटन स्थलों की तरह चर्चित नहीं है, लेकिन इतिहास की नजर से देखें तो यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक कड़ियों में से एक है. यह जगह बताती है कि सभ्यताएं अचानक गायब नहीं होतीं, बल्कि वे अपनी परंपराएं, तकनीक और संस्कृति अगली दुनिया को सौंपकर आगे बढ़ जाती हैं. मेरठ की भीड़भाड़ वाली जिंदगी के नीचे आज भी कांस्य युग की वह कहानी दबी हुई है, जहां मिट्टी की ईंटों से बनी एक चौकी हजारों साल बाद भी इतिहास की पहरेदारी कर रही है.