गोस्वामी तुलसीदास और रामचरित मानस में राम की कीर्ति

श्रेणी: General | लेखक : The hindu Today | दिनांक : 18-Feb-26 02:00:37 AM

राम की कीर्ति और तुलसीदास का संदेश

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस में लिखा है: "सियाराम सियाराम जय जय राम कीरत भनि भूति, भल सोई सुरसर सम सब कर हित होई"।

इस पंक्ति में तुलसीदास जी के दृष्टि में भगवान राम की कीर्ति पताका फहर रही होती है, जो गंगा की तरह सबका हित करती है। इसमें ना कोई ऊंच-नीच, जाति, वर्ग या रंग भेद है। राम की कीर्ति सब प्राणी मात्र के लिए मंगलकारी है।

राम का वैश्विक और सार्वकालिक प्रभाव

सूर्यवंशी अयोध्या के राम की कीर्ति आज भी पूरे विश्व को प्रकाशमान कर रही है। दक्षिण अमेरिका, रोम, यूनान, मिस्र, अफगानिस्तान, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण मानव जाति को सदाचार और उदात्त भाव की सीख दे रही है।

इंडोनेशिया में एक मुस्लिम शिक्षक ने बताया कि वह रामायण पढ़ते हैं ताकि अच्छा मनुष्य बन सकें। श्री रामचरित मानस में राम के चरित्र में जीवन की नैतिक शिक्षा और आदर्श जीवन के सबक मौजूद हैं

रामायण और ऐतिहासिक प्रमाण

अयोध्या के राम का जीवन मृत्यु लोक में देवकाया प्रवेश का मंत्र है। राम के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए आप दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत के आस-पास के देशों में रामायण के स्थूल प्रमाण देख सकते हैं।

पूर्व निदेशक वाईपी सिंह के अनुसार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व में राम और रामायण के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रमाण मिलते हैं। पाकिस्तान में हिंगलाज भवानी मंदिर और कराची का रामबाग ऐतिहासिक स्थल हैं।

राम और यूरोप

मध्य पूर्व और यूरोप में भी राम के नाम और रामायण से जुड़े प्रमाण मिलते हैं। मिस्र के प्राचीन शासकों ने अपने नाम में “रामेश” जोड़ा। इटली में रामायण के पात्रों जैसे बाली, सुग्रीव और हनुमान के चित्र भी पाए गए। रोमन सभ्यता में भी राम और रामायण के आदर्शों का प्रभाव दिखाई देता है।

रामचरित मानस का अंग्रेजी अनुवाद और वैश्विक योगदान

ब्रिटेन के फ्रेडरिक सालमन ग्राउस ने 1865 में गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरित मानस का पहला अंग्रेजी अनुवाद किया। राम और रामायण की शिक्षा आज भी विश्वभर में सत्य और नैतिकता का प्रतीक हैं।