अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेरठ में हजारों छोटी फैक्ट्रियां, घरेलू उत्पादन इकाइयां और पारिवारिक व्यवसाय संचालित होते हैं. यही मजबूत MSME नेटवर्क इसे 'वर्कशॉप इकॉनमी' की पहचान देता है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मेरठ का प्राचीन नाम 'मयराष्ट्र' (असुर राजा मायासुर का राज्य) था. इसके बाद इसका नाम बदलकर 'मैरथ' और फिर 'मीराठ' हुआ, जो धीरे-धीरे वर्तमान में मेरठ हो गया. महाभारत काल में कौरवों की राजधानी 'हस्तिनापुर' भी इसी जिले का प्रमुख ऐतिहासिक क्षेत्र है.

इसका मतलब है ऐसी अर्थव्यवस्था जो किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि लोगों की जरूरत और समस्याओं से जन्म लेती है. मेरठ का इलेक्ट्रिकल सेक्टर इसी मॉडल का उदाहरण है.

1980–90 के दशक में छोटे वर्कशॉप्स में तकनीशियनों ने विदेशी मशीनों को खोलकर समझा और उन्हें भारतीय बिजली व्यवस्था के अनुसार री-इंजीनियर करना शुरू किया. यहीं से लोकल इलेक्ट्रिकल क्लस्टर विकसित हुआ.

मेरठ में लंबे समय तक बिजली कटौती और वोल्टेज की समस्या रही. इसी जरूरत ने स्थानीय कारीगरों को स्टेबलाइजर, इन्वर्टर और इलेक्ट्रिकल उपकरणों का लोकल इकोसिस्टम बनाने के लिए प्रेरित किया.

यहां से मिट्टी के बर्तन, मनके, चूड़ियां, टेराकोटा वस्तुएं, तांबे के उपकरण और हड़प्पाई निर्माण अवशेष मिले थे.

दोनों स्थल मेरठ क्षेत्र में स्थित हैं और इतिहासकार इन्हें हड़प्पा से वैदिक काल के संक्रमण की महत्वपूर्ण कड़ी मानते हैं.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 1958-59 में यहां खुदाई की थी.